Thursday, September 30, 2010

बेजोड़ शिल्प व कलाकृतियों का नमूना है चंपावत का बालेश्वर मंदिर

कत्यूरी शासकों द्वारा निर्मित बालेश्वर मंदिर
                 हरीश उप्रेती करन, चंपावत

कभी चंद वंशीय राजाओं की राजधानी रहे चंपावत के प्राकृतिक सौंदर्यता से परिपूर्ण विभिन्न ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व के स्थल इसकी गौरवगाथा को खुद ही बयां करते हैं। इन स्थलों में मौजूद भित्ती चित्र व कलाकृतियां इसका जीता-जागता उदाहरण है। यहां मौजूद सभी स्थलों में से सबसे महत्वपूर्ण व पर्यटकांे के आकर्षण का केंद्र है बालेश्वर का मंदिर।

नगर की मुख्य सड़क से मात्र सौ मीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर शिल्प का बेजोड़ नमूना है। 12 वीं सदी में कत्यूरी शासकों द्वारा निर्मित बालेश्वर मंदिर समूह अपने समय में देश में प्रचलित सर्वोत्तम शिल्प शैलियों की अनूठी मिशाल है। माना जाता है कि चंपावत के अधिकांश शिल्प कत्यूरी राजवंश ने ही निर्मित किये थे। मंदिरों के समूह बालेश्वर परिसर में श्रृंगार की देवी चंपा व बाली, सुग्रीव सहित अन्य मंदिर भी हैं। मूल रूप से इसे शिव का मंदिर माना जाता है। जानकारों के मुताबिक बलुआ व ग्रेनाइड किस्म के पत्थरों से निर्मित मंदिर समूह की छतें संकुल पर्वतों की भांति निर्मित हैं। शिखर के ठीक नीचे गर्भ गृह बनाये गये हैं। मंदिरों में बाहरी तथा भीतरी दीवारों पर सुंदर कलात्मक मूर्तियां बनाई गयी हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार से पहले चार खंभों पर टिके मंडप इसको अलग ही रूप प्रदान करते हैं। मंडप की उल्टी छतों पर नृत्य करती अप्सराओं की मूर्तियां निर्मित की गई हैं।
मंडप के गर्भगृह के अंतराल में कई श्रृंगारिक मूर्तियां निर्मित है। गुंबदनुमा मंदिर के बीचों बीच शिवलिंग की स्थापना की गई है। मंदिर परिसर में कुछ समय व्यतीत करने व मूर्तियों को गौर से निहारने पर प्रतीत होता है मानों हम कहीं स्वर्ग लोक में हों और विभिन्न देवी-देवता, अप्सराएं व पशु-पक्षी क्रीडा कर रहे हों। इन मूर्तियों को निहारने पर ऐसा लगता है जैसे वो अभी तुरंत सजीव हो नृत्य कर उठेंगी। मंदिर की दीवारों पर नृत्य करती अप्सराएं व वाद्ययंत्र बजाती मूर्तियां पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करने लगती हैं। इन मूर्तियों की विभिन्न प्रकार की भाव भंगिमाएं ऐसी प्रतीत होती हैं मानों जीवन का सारा रंग इनमें ही डाल दिया गया हो। पत्थरों को छेनी व हथौड़े से काटकर बनाई गई ये बेजान मूर्तियां पास से देखने पर ऐसी लगती हैं जैसे तुरंत ही संवाद करने लगेंगी। इस मंदिर में निर्मित मूर्तियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें हर किसी को अपने व्यक्तित्व की झलक देखने को मिलती है। मंदिर में निर्मित मूर्तियों में जहां विरह झेल रहे प्रेमी को अपनी प्रेमिका नजर आती है वहीं धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को अपने ईष्ट की झलक दिखाई देती है। 

Thursday, September 23, 2010

तराई में जाने कहां से आ गया एड्स

एचआईवी संक्रामित रोगियों की संख्या 18१ पहुंची

सात वर्ष में 15 से अधिक एड्स रोगियों की मौत

           जहांगीर राजू (रुद्रपुर से)

तराई में एड्स के एचआईवी संक्रामित रोगियों की संख्या हर वर्ष बढ़ती जा रही है। जिले में एड्स से अबतक 15 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। तराई में हो रही एड्स रोगियों की मौत से स्वास्थ्य विभाग की ओर से चलाए जा रहे जन जागरुकता अभियान को आईना दिखा दिया है। इस प्रकार देखा जाए तो औद्योगिक नगरी रुद्रपुर में एड्स का सिकंजा फैलता जा रहा है।

गौरतलब है कि रुद्रपुर व काशीपुर में शुरु हुए औद्योगिकरण के बाद से ही यहां एड्स रोगियों की संख्या में हर वर्ष बढ़ोत्तरी हो रही है। एड्स विशेषज्ञ डा. राकेश कुमार के मुताबिक जिले के शहरी क्षेत्रों में बाहरी लोगों का आवागमन बढऩे के कारण ही एड्स रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। जिसमें उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों व वाहन चालकों की संख्या अधिक होती है। देखा जाए तो वर्ष 2003 से जिले में राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल प्रोग्राम शुरू हुआ। कार्यक्रम शुरू होने के बाद वर्ष 2003 में जिले में एचआईवी संक्रामित रोगियों की संख्या मात्र 2 थी। वर्ष 2004 में यह संख्या 8, 2005 में 8, 2006 में 10, 2007 में 29, 2008 में 3२ वर्ष 2009 में 49 तथा वर्ष 2010  में अबतक जिले में एड्स संक्रामित रोगियों की संख्या 30 तक पहुंच गयी। इस प्रकार देखा जाए तो जिले में  अबतक एचआईवी पीड़ित 18१ रोगियों की पहचान हुई हैं, जिसमें से 15 से अधिक रोगियों की मौत हो चुकी है। जिले में मौजूद एचआईवी संक्रामित रोगियों में सबसे अधिक रोगी रुद्रपुर में है। इसके बाद काशीपुर में सबसे अधिक एचआईवी संक्रामित रोगी हैं।
 तराई में लगातार हो रही एड्स पीड़ित रोगियों की मौत ने सरकार की ओर से चलाए जा रहे जन जागरूकता अभियान की कलई खोलकर रख दी है। जानकारी के अभाव में एड्स रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जागरुकता न होने के कारण पिछले दिनों एक महिला को एड्स रोगी होने की जानकारी जिला अस्पताल में भर्ती होने के बाद मिली, जिसकी बाद में उपचार के दौरान उसकी मौत हो गयी। तबतक महिला का पति व बेटा भी एड्स से संक्रामित हो चुका था। समय के रहते यदि महिला के परिवार को एड्स के खतरों का पता चल जाता तो शायद पति व बच्चे को एड्स रोगी होने से बचाया जा सकता था।
राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल कार्यक्र्रम के प्रोग्राम अधिकारी डा.आरके पांडे ने बताया कि रुद्रपुर व काशीपुर में औद्योगिकरण के चलते बाहरी क्षेत्रों से आने-जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। जिसके चलते क्षेत्र में एड्स रोगियों की संख्या बढ़ रही है। साथ ही जिले में रुद्रपुर के बाद जसपुर, काशीपुर व खटीमा में आईसीटीएल सेंटर खुलने के बाद अधिक रोगियों की पहचान हुई है।
 उन्होंने बताया कि जिले के किच्छा व सितारगंज क्षेत्र में आईसीटीएल सेटर खुलने के बाद इन रोगियों की संख्या में और अधिक बढ़ोत्तरी होगी। उन्होंने बताया कि एड्स की रोगथाम के लिए विभाग की ओर से जन जागरुकता अभियान चलाए जा रहे हैं। साथ स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से सेक्स वर्करों को एड्स के प्रति जागरुक किया जा रहा है।


Monday, September 20, 2010

जल के जलजले से मालपा बनते पहाड़ के गांव

गांवों की संवेदनशीलता के प्रति जागरुकता जरुरी

भारी बरसात के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों मे हो रही जनहानि को रोकने के लिए व्यापक अध्ययन की जरुरत।
            
          जहांगीर राजू (रुद्रपुर से)

पर्वतीय क्षेत्रों में भारी वर्षा के दौरान गांवों में हो रहे हादसे हमें बार-बार मालपा की याद दिला रहे हैं। हाल ही में बागेश्वर जिले के सुमगढ़ गांव में 18 स्कूली बच्चों के जमींदोज होने की घटना को अभी हम भूले ही नहीं थे कि अल्मोड़ा में बाल्टा गांव में 13 व देवली में 10 व नैनीताल में 5 लोगों के जमींदोज हो जाने की घटना ने हमें एकबार फिर से पहाड़ की संवेेदनशीलता के बारे में आगाह कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि पर्वतीय क्षेत्रों में सैकड़ों गांव भूस्खलन, बादल फटने व भूकंप की दृष्टि से बेदह संवेेदनशील हैं। बावजूद सरकार की किसी भी संस्था की ओर से पर्वतीय क्षेत्रों के संवेदनशील गांवों का भू-वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया। यदि समय के रहते राज्य के संवेदनशील क्षेत्रों का अध्ययन कर वहां रह रहे लोगों को पुर्नवासित करने की व्यवस्था नहीं की गयी तो पर्वतीय क्षेत्रों के अन्य संवेेदनशील गांवों को भी मालपा बनने से कोई नहीं रह पाएगा। इसके साथ ही राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों के बड़े शहरों में बढ़ रहा जनसंख्या का दबोव व संवेदनशील क्षेत्रों के अंधाधुंध दोहन के चलते नैनीताल व अल्मोड़ा जैसे शहर खतरे की जद में आते जा रहे हैं। अल्मोड़ा शहर के विभिन्न क्षेत्रों में 200 से अधिक मकानों का क्षतिग्रस्त होना इसका ताजा उदाहरण हैं। यहां स्लोप वाले क्षेत्रों में मनमाने ढंग से कटान कर बड़े-बड़े भवनों को बनाया जाना इसका प्रमुख कारण हैं। इसी तरह का दबाव नैनीलात शहर में भी लगातार बढ़ रहा है। जिसके चलते नैनीताल की मालरोड लगातार झील की तरफ धंसती जा रही है।  ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक जन जागरुकता नहीं होने व पर्वतीय क्षेत्रों के शहरों में बड़ रहे जनसंख्या के दबाव के कारण संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से गांवों व शहरों में हर वर्ष बरसात, भूस्खलन व भूकंप के चलते बड़े-बड़े हादसे हो रहे हैं। बावजूद इसके पर्वतीय क्षेत्रों के लाखों लोग संवेदनशील क्षेत्रों में रहने को मजबूर हैं।

अल्मोड़ा जिले के बाल्टा गांव में हुए भूस्खलन का दृश्य
ऐसे में शासन से उम्मीद की जाती है कि पर्वतीय क्षेत्रों गांवों व शहरों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए वहां का व्यापक भू-वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए। अध्ययन के दौरान जो क्षेत्र बादल फटने, भूस्खलन व  भूकंप की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील हैं, उन क्षेत्रों के लोगों को सुरक्षित स्थानों में पुर्नवासित किए जाने की जरुरत है। इस स्थिति में यदि सरकार ने राज्य में जल के जलजले से हुई तबाही को फिर से भुला दिया तो पर्वतीय क्षेत्रों के गांवों में फिर से मालपा जैसे हादसे होते रहेंगे। ऐसे में शासन व प्रशासन चहकर भी कुछ नहीं कर पाएगा।




पहाड़ों का भू-वैज्ञानिक अध्ययन जरुरी-पंत

रुद्रपुर। प्रमुख भू-वैज्ञानिक प्रो.चारू सी पंत बताते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों कि कई गांव, घाटियां व शहर भूकंप, भूस्खलन व बदलों के फटने की घटना के लिए बेहद संवेदनशील हैं। ऐसे में राज्य के संवेदनशील क्षेत्रों का भू-वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना जरुरी हैं। अध्ययन के बाद संवेदनशील क्षेत्रों में रह रहे लोगों को जागरुक करने व भूकंरोधी भवनों के निर्माण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

 उन्होंने कहा कि यदि लोगों को संवेदनशील क्षेत्रों में होने वाली घटनाओं के प्रति यदि पहले से ही जागरुक कर दिया जाए तो इससे आपदा के दौरान होने वाली जनहानि को काफी कम किया जा सकता है। प्रो.पंत ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के बड़े शहरों में प्राकृतिक संसाधनों के मनमाने दोहन को कम करने की भी जरुत है। ऐसे शहरों का यदि सुनियोजित विकास होगा तो इन शहरों में बड़े हादसों की संभावनाओं को कम किया जा सकेगा।

Thursday, September 16, 2010

फिश एंगलिंग के लिए लोकप्रिय हो रहा है मरचूला

देशी-विदेशियों को खासा रिझा रहा है एंगलिंग का खेल

रामगंगा नदी में पाई जाने वाली महाशीर मछली अल्मोड़ा के मरचूला के तीन गांवों की तस्वीर बदल रही है। 

चंदन बंगारी
रामनगर

रामगंगा नदी में पाई जाने वाली महाशीर मछली अल्मोड़ा जिले के मरचूला के तीन गांवों को एक नई पहचान दे रही है। नदी किनारे बसा गुमनाम क्षेत्र मरचूला पर्यटन मानचित्र में अहम मुकाम हासिल कर रहा है। बीते कुछ सालों से यहां देशी-विदेशी सैलानियों की आमद तेजी से बढ़ रह़ी है। इसका श्रेय महाशीर नाम की एक र्स्पोट्स फिश को जाता है। यहां बहने वाली रामगंगा नदी में महाशीर की एंगलिंग का खेल सैलानियों के बीच खासा लोकप्रिय हो रहा है। जिसके चलते क्षेत्र में फिशिंग लॉजों और रिसोर्टों का निर्माण हो रहा है। पर्यटकों द्वारा एंगलिंग को बेहद पसंद किए जाने के कारण सरकार को जहां राजस्व का लाभ मिल रहा है, वहीं ग्रामीणों को भी इससे आर्थिक फायदा हो रहा है।
शिवालिक पर्वत श्रंखलाओं के बीच अल्मोड़ा व पौड़ी जिले की सीमा पर मरचूला गांव स्थित है। कुछ साल पहले तक गुमनाम रहे इस पूरे इलाके को गोल्डन महाशीर मछली ने नई पहचान दी है। साफ पानी में पाई जाने वाली महाशीर को नदियों की बाघिन भी कहा जाता है। रामगंगा में महाशीर मछली अंधाधुंध शिकार की वजह से खात्मे की कगार पर थी। मगर महाशीर संरक्षण की मुहिम को पर्यटन से जोड़ने से नदी में गोल्डन महाशीर की तादात बढ़ने लगी है। पांच साल पहले सरकार ने महाशीर संरक्षण को पर्यटकों व ग्रामीणों से जोडकर नदी का कुछ हिस्सा संरक्षण और एंगलिंग करने के लिए चार लोगों को लीज पर दिया था। लीज नियम के मुताबिक पर्यटकों से होने वाली आय का कुछ हिस्सा क्षेत्र के तीन गांवों बलोली, चिन्पानी, बकरोटी के ग्रामीणों व कुछ सरकार को देने की बात तय हुई थी। हालांकि चार में से दो ही लोग एंगलिंग का कार्य कर रहे है। मगर एंगलिंग के कारण गांवों की बंजर पड़ी जमीनों पर होटलों का विकास होने लगा है। र्स्पोटस फिश होने के कारण एंगलिंग का शौक सैलानियों में तेजी से पसंद किया जाने लगा। मछली को फिशिंग राड से पकड़ने, वजन नापने, इसके साथ फोटो खिंचाने व वापस नदी में छोड़ने का खेल एंगलिंग कहलाता है। देशी- विदेशी सैलानी यहां के फिशिंग लॉजों में ठहरकर एंगलिंग का लुत्फ उठा रहे है। 
एलिंग के लिए मरचूला आई फ्रांस निवासी फ्रेड बेंसले का कहना है कि बाघ, हाथी देखने के साथ ही एंगलिंग का अपना मजा है। इसको और विकसित करने व आने वाले पर्यटकांें को सुविधाएं देने की जरूरत है। मरचूला जो कभी पहाड़ की तलहटी में बसी उजाड़ जगह जैसा था। पिछले कुछ सालों से यहां करीब दर्जन भर रिसोर्ट और कैम्प बन चुके हैं। कार्बेट पार्क की सीमा पर होने व रामनगर से नजदीकी होने का भी इसे भरपूर फायदा मिल रहा है। नए पर्यटन गंतव्य के विकास से स्थानीय लोग भी खुश हैं। ग्रामीण मनवर नेगी का कहना है कि गांवों की जमीनें बंजर पड़ी हुई थी। एंगलिंग के चलते जहां महाशीर संरक्षण कार्य में भी तेजी आ रही है। शुरू में यहां कौड़ियों के दाम जमीनें बिकी, मगर अब जमीनों के अच्छे दाम मिलने व पर्यटन से जुड़कर ग्रामीणों की रोजी-रोटी चल रही है। रामगंगा के आसपास के तीन गांवों की ईको विकास समितियों को रॉड फीस और फिशिंग लॉज के टर्नओवर का एक हिस्सा भी मुनाफे के रूप में दिया जा रहा है।
 महानगरों की भागमभाग से दूर पहाड़, नदी, जंगल, पानी के बीच कुछ पल रहने की चाहत रखने वालों के लिए मरचूला नया आशियाना बन रहा है। तो फिर देर किस बात की, महाशीर के बहाने चल पड़े़ं तनाव मिटाने व कुछ पल सूकून के लिए मरचूला की ओर।

क्या फायदे है ग्रामीणों को 

- पर्यटकों से ली जाने वाली फिशिंग राड का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा 
- एंगलिग से होने वाली कुल आय का 5 प्रतिशत
- उत्तराखंड फारेस्ट डेवलपमेट कारपोरेशन के जरिए रूपया गांवों की ईको विकास समिति को जाता है।
                                                                                - गांवों के आसपास बने होटलों में मिलता है रोजगार

नैनीताल फिल्म महोत्सव अब 29 से 31 अक्टूबर तक

सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने की उल्लेखनीय पहल

डा. प्रयाग जोशी व बी मोहन नेगी सम्मानित होंगे

गिर्दा व निर्मल पांडे को होगा समर्पित
स्थान-शैलेहाल नैनीताल
              
जहांगीर राजू (रुद्रपुर से)

जन संस्कृति मंच के सहयोग से युगमंच नैनीताल का तीन दिवसीय फिल्म महोत्सव अब 29 से 31 अक्टूबर तक नैनीताल में होगा। यह फिल्म महोत्सव जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा व फिल्म अभिनेता निर्मल पांडे को समपिर्त रहेगा। इस महोत्सव में सार्थक सिनेमा को आम जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। महोत्सव में देशभर के प्रख्यात फिल्म व डाक्यूमेटरी निदेशक के पहुंचने की उम्मीद है।
युगमंच के निदेशक जहूर आलम ने बताया कि दुनियाभर के सार्थक सिनेमा को आम जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से नैनीताल में पिछले दो वर्षों से फिल्म महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि फिल्म महोत्सव के बहाने देश व राज्य के साहित्यकारों, नाटककारों, चित्रकारों व फिल्मकारों को एक मंच में लाने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने बताया कि देश व दुनिया में डाक्यूमेंटरी के माध्यम से बन रही बेहतरीन फिल्मों को महोत्सव में प्रदर्शित किया जाएगा। साथ ही पहाड़ के बड़े फिल्म निर्देशकों की फिल्मों को भी दिखाया जाएगा। महोत्सव में प्रख्यात फिल्म निदेशक अल्मोड़ा निवासी वसुधा जोशी की फिल्म अल्मोडय़ान, वाइसेज फ्राम व फोर माया का प्रदर्शन होगा। पहाड़ की उभरती फिल्म निदेशक बेला नेगी की फीचर फिल्म दायें या बाएं का प्रदर्शन होगा। इस फिल्म में गिर्दा स्कूल के प्रिंसिपल की भूमिका में दिखाई देंगे। यह पूरी फिल्म पहाड़ की पृष्ठभूमि पर तैयार की गयी है। जो शीघ्र ही बड़े परदे पर प्रदर्शित होने वाली है। इस मौके पर प्रदीप पांडे की गिरीश तिवारी गिर्दा व निर्मल पांडे पर बनी डाक्यूमेंटरी का भी प्रदर्शन होगा। इस दौरान चित्रकार बी मोहन नेगी के चित्रों की प्रदर्शनी भी लगायी जाएगी। नाटकों की कड़ी में मोहन थपलियाल रचित अक्ल बड़ी या भैंस का मंचन किया जाएगा। साथ ही 29 सितंबर को बच्चों के सत्र के रुप में बाल फिल्मों का मंचन होगा।
महोत्सव में प्रसिद्ध साहित्यकार डा.प्रयाग जोशी व चित्रकार बी मोहन नेगी को सम्मानित किया जाएगा। महोत्सव में असम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण मुख्य वक्ता के रुप में मौजूद रहेंगे। इस दौरान प्रख्यात फिल्म निदेशकों के बीच फिल्मों व डाक्यूमेंटरी को लेकर चर्चा भी की जाएगी। महोत्सव में फिल्म निदेशक संजय काक, राजीव कुमार, परेश कांदार, दवरंजन सारंगी, अजय पीबी, पंकज चतुर्वेदी, साहित्यकार वीरेन्द्र डंगवाल, पद्मश्री डा.शेखर पाठक, बल्ली सिंह चीमा, अजय कुमार, अजय भारद्वाज आदि भागीदारी करेंगे। 
फिल्म महोत्सव संजय जोशी की देखरेख मे सम्पन्न होगा।

Wednesday, September 15, 2010

उत्तराखण्ड की संस्कृति के प्रसार को समर्पित “मेरा पहाड़” नेटवर्क

इन्टरनेट पर अब उपलब्ध है उत्तराखण्ड के तीज-त्यौहारों की सम्पूर्ण जानकारी

 जहांगीर राजू (रुद्रपुर से)

किसी भी संस्कृति या समुदाय का आईना, उसकी धरोहरें, सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्य, संस्कृति, बोली-भाषा, संगीत इत्यादि होता है। मेरा पहाड़ डाट काम नेटवर्क (MeraPahad.com and www.apnauttarakhand.com/) भी भारत के एक राज्य उत्तराखण्ड को समर्पित है।
उत्तराखण्ड की सामाजिकता, संस्कृति और पौराणिकता बहुत ही समृद्ध रही है। युगों-युगान्तरों से अनेक ऋषि-मुनि ही नहीं बल्कि अनेक धर्मों, संस्कृतियों के प्रवर्तकों और अनुयायियों का तपस्थल यहां पर रहा है। यहीं पर उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर शेष दुनिया को उससे परिचित कराया है।
उत्तराखण्ड की इसी समृद्ध, पौराणिक एवं प्रमाणिक विरासत को सहेजने के उद्देश्य से मेरा पहाड़ नेटवर्क” ने यह प्रयास प्रारम्भ किया है। भविष्य में वेद-पुराणों की तरह इंटरनेट भी सभी चीजों को सहेजने का एक  सुगम और सहज माध्यम बन जायेगा। आधुनिक भूमंडलीकरण के दौर में सभी संस्कृतियों का सामाजिक ताना बाना, अपनी जड़ों से दिनोंदिन दूर होता चला जा रहा है और उत्तराखण्ड, जहां रोजी-रोटी के पलायन करना एक मजबूरी है। वहां के लोग बाहर आकर धीरे-धीरे अपनी संस्कृति और परम्पराओं से स्वतः ही दूर होते चले जा रहे हैं।

उत्तराखण्ड से बाहर देश-विदेश में रह रहे लोगों को अपने पहाड़ की जड़ों से जोड़कर रखने और उत्तराखंड के बारे में और अधिक जानने के उत्सुक उत्तराखंड प्रेमियों के लिये मेरा पहाड़ नेटवर्क” ने यह प्रयास शुरु किया। हर छह कोस में बोली, पानी और रीति-रिवाजों में थोड़ा सा अन्तर आ ही जाता है। तो ई-ग्रुप और फोरम ही ऐसे माध्यम है, जिसमें हर आम उत्तराखण्ड प्रेमी, एक सदस्य बनकर अपने इलाके की बोली, रिवाज, त्योहारों आदि से हमें परिचित कराता है और ग्रुप/ फोरम के माध्यम से वह सबको सुलभ हो जाता है। मेरा पहाड़ नेटवर्क” का प्रयास है कि हम अधिक से अधिक उत्तराखंड प्रेमियों को इससे जोड़े और अधिक से अधिक प्रमाणिक जानकारी हमारे फोरम के माध्यम से उपलब्ध हो। भविष्य में यह फोरम सम्पूर्ण उत्तराखण्ड की जानकारियों को अपने आप में समाहित कर लेगा और इस प्रकार इंटरनेट की विशाल दुनिया में संपूर्ण उत्तराखण्ड मेरा पहाड़ के रुप में सामने आ जायेगा। इन्ही जानकारियों को थोड़े और प्रमाणन के साथ अपनी अन्य साइट ApnaUttarakhand.com पर भी उपलब्ध कराया जाता है।

दूसरा कारण यह भी कि पहाड़ से आजीविका की तलाश में बाहर गया प्रवासी आज अपनी पहचान, अपनी जड़ों के जुड़ाव को जानने के लिये छटपटा रहा है। क्योंकि बाहर की दुनिया में भी कई छोटी-छोटी दुनिया अलग-अलग समुदाय के रुप में  हैं। जिनकी अपनी-अपनी रीति और संस्कृति है, उन सब को देखकर अब उत्तराखण्डी प्रवासी भी अपनी संस्कृति को जानने के लिये छटपटा रहा है। इसलिये उनको, उनकी जड़ों से, उनकी संस्कृति से, रीति-रिवाज, विकास की समस्याओं, पर्यटक और धार्मिक स्थलों, मेलों-त्यौहारों से परिचित कराने का हमारा छोटा सा प्रयास है, मेरा पहाड़।
 कोशिश यह की गयी है कि "मेरा पहाड़ नेटवर्क" की विभिन्न वेबसाइटों के माध्यम से उत्तराखण्ड के विभिन्न पहलुओं यथा - संस्कृति, तीज-त्यौहार, बोली-भाषा, व्यक्तित्व, लोक-संगीत, फिल्म, साहित्य और पर्यटन आदि के बारे में पुख्ता जानकारी उपलब्ध करायी जाये.

एक अन्य कारण यह है कि हर वर्ष लाखों पर्यटक हमारे उत्तराखंड की प्राकृतिक सुन्दरता को देखने के लिये यहाँ खिंचे चले आते हैं। उन लोगों को यहाँ आने से पहले बहुत सी जानकारियां नहीं होती। यदि वह इंटरनैट पर जानकारियाँ ढूंढते भी हैं तो उन्हें अधिंकाश प्रायोजित  जानकारी ही मिल पाती है जिस पर पूरी तरह से विश्वास करना कठिन सा होता है। मेरा पहाड़ नेटवर्क” का यह प्रयास है कि अपने सदस्यों के माध्यम से अपनी साइट्स पर ऐसी प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध करायें जो यहाँ आने वाले सैलानियों के लिये मार्ग-दर्शन का काम करें और वह वास्तविक उत्तराखंड को और नजदीक से जान समझ पायें।

विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी आपकी शंकाओं का समाधान करने के लिये विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों से भी आपका परिचय करवाते हैं ताकि आप उनसे सीधे प्रश्न पूछ कर अपना उत्तर पा सकें। समय समय पर उत्तराखंड से जुड़े महत्वपूर्ण हस्तियों से लाइव चैट का आयोजन भी करवाया जाता  है जिसमें एक सदस्य के रूप में उनसे अपने प्रश्न पूछ सकते हैं।
मेरा पहाड़ नेटवर्क” सिर्फ इंटरनेट तक ही सीमित नहीं है, इंटरनेट के जरिये समान सोच के लोगों को जोड़क, उनका एक समूह बनाकर उत्तराखण्ड के लिये धरातल पर भी काम किया जा रहा है। इसी को ध्यान में रखकर एक उप-समूह बनाया गया क्रियेटिव उत्तराखण्ड-म्यर पहाड़, यह उत्तराखण्ड के युवाओं का सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और साहित्यिक मंच है। यह पुरानी पीढ़ी की विरासत को अगली पीढी तक पहुंचाने और इसे सहेजने का प्रयास करता है। पहाड़ से बाहर रह रहे युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़े रहने और विभिन्न गतिविधियों से पहाड़ को जानने और समझने का प्रयास कर रहा है। विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे युवा इसमें भागीदारी कर रहे हैं और इस आयोजन को आगे बढ़ाने के लिये हमें विभिन्न क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञों का आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। "Creative Uttarakhand - Myor Pahad" के युवा साथी उत्तराखण्ड के विभिन्न हिस्सों में जाकर कैरियर गाइडेन्स कैम्प तथा  मेडिकल कैम्प आयोजित करने के साथ ही उत्तराखण्ड की दिवंगत विभूतियों के पोस्टरों की एक श्रंखला भी चला रहा है जिसमें अब तक श्रीदेव सुमन, ऋषिबल्लभ सुन्दरियाल, डी.डी. पन्त एवं बिपिन त्रिपाठी सहित 8 विभूतियों के पोस्टर निकाले गये हैं. इसके अलावा "हिमालय बसाओ, हिमालय बचाओ" विचार गोष्टी श्रंखला के माध्यम से उत्तराखण्ड के ज्वलन्त मुद्दों पर बहस भी चलाई जा रही है. 

अपनी इस छोटी सी कोशिश से उत्तराखण्ड की समृद्ध धरोहर, सांस्कृतिक एकता, सामाजिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखने, भूमंडलीकरण के दबाव में प्रभावित होते सामाजिक समरसता की अपनी परंपरा को बचाने और आर्थिक रुप से संपन्न पहाड़ की कल्पना को साकार रुप देने में सहभागी बनना चाहते हैं।
मेरा पहाड़ डाट काम नेटवर्क ने दिनांक 24 अप्रैल, 2010 को एक नई वेबसाईट हिसालू -उत्तराखण्ड सन्देश का लोकार्पण किया। जिसका शुभारम्भ उत्तराखण्ड सरकार के माननीय संसदीय कार्य मंत्री श्री प्रकाश पन्त जी ने किया। www.hisalu.com उत्तराखण्ड से सम्बन्धित सभी वेबसाईटस और ब्लागों का संकलक (Aggregator) है। अर्थात उत्तराखण्ड से सम्बन्धित कोई भी नई जानकारी इण्टरनेट पर उपलब्ध होते ही आप इसे एक ही साईट www.hisalu.com पर देख पायेंगे। इसलिये अब इन्टरनेट द्वारा उत्तराखण्ड से जुड़ी अद्यतन (updated) जानकारी आप इस साईट के माध्यम से आसानी से प्राप्त कर सकेंगे।
उत्तराखण्ड के प्रवासीजनों को उनकी संस्कृति से जोड़े रखने के लिये यह जरुरी है कि लोक संस्कृति के आधार पर मनाये जाने वाले त्यौहारों या महत्वपूर्ण तिथियों की जानकारी उनको हो, लेकिन परदेश में पंचांग आदि की सुविधा नहीं होती, अगर आप पंचांग ले भी आये तो बांचने की समस्या आती है। लेकिन इस समस्या को दूर करने का प्रयास किया गया है। पूरे विश्व में फैले प्रवासी उत्तराखण्डी इस आनलाइन पंचांग का फायदा उठाकर समय पर आने वाले त्यौहारों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं और बड़े उत्साह से मकर संक्रान्ति, घी-संक्रान्त, दशौर (गंगा दशहरा), जने-पुन्युं तथा अन्य  पारम्परिक त्यौहारों को मनाते हैं. उत्तराखण्ड में प्रचलित वाणी भूषण, महिधर एवं रामदत्त पंचांगों के आधार पर माह भर के व्रत, त्यौहार, ग्रहण, महत्वपूर्ण तिथियों आदि की जानकारी आप पंचांग तथा त्यार-बार से ले सकते हैं।
और भी है बहुत कुछ जिसको शब्दों में व्यक्त कर पाना लगभग असंभव है, उसे तो आप साइट्स से जुड़ कर ही समझ सकते हैं   तो फिर अब देर क्यों, आइये जुड़िये, जानिये पहाड़ को, समझिये पहाड़ को और जुड़िये अपनी पौराणिक और महान संस्कृति से, जिसका जरिया है। www.MeraPahadForum.com

Saturday, September 11, 2010

स्मैक के नशे में धुंआ होती तराई की जवानी

तराई में सफेद नशे का काला कारोबार युवाओं को अपने शिकंजे में कसता जा रहा है।
                             (जहांगीर राजू रुद्रपुर से)

तराई में सफेद नशे का काला कारोबार लगातार फैलता जा रहा है। जिसके चलते स्मैक के नशे में तराई की जवानी धुंआ हो रही है। यहां के युवा अफीम, स्मैक व हेरोइन के नशे के शिकंजे में फंसते जा रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि तराई में औद्योगिकरण बढऩे के साथ ही यहां चरस, अफीम स्मैक व हेरोइन का काला कारोबार भी अचानक बढ़ा है। ऊधमसिंह नगर जिले के नेपाल व उत्तर प्रदेश की सीमा से जुड़े रहने के कारण यहां बड़े पैमाने पर तस्कर सक्रिय हैं। यह तस्कर नेपाल व यूपी से स्मैक व हेरोइन लाकर तराई के युवाओं को नशे का शिकार बना रहे हैं। स्थिति यह है कि स्मैक व हेरोइन की तस्करी के चलते तराई में बढ़े पैमाने पर युवा सफेद नशे के आदि हो रहे है।
पुलिस के आंकड़ों पर अगर नजर डाली जाए तो वर्ष 2009 में 51 लोगों को स्मैक, अफीम, हेरोइन व चरस की तस्करी करते पकड़ा गया। जिसमें 23 जनवरी 2009 को पंतनगर पुलिस ने बागपत उत्तर प्रदेश निवासी अरविलंद तोमर को 80 ग्राम हेरोइन के साथ गिरतार किया था। 26 जनवलरी को पंतनगर पुलिस ने सिडकुल तिराहे के नेवाबगंज बरेली निवासी नेम चन्द्र से 7.5 लाख रुपये की हेरोइन बरामद की थी। 2 फरवरी को खटीमा पुलिस ने देवरी निवासी कृष्ण सिंह को 450 ग्राम चरस के साथ गिरतार किया था। 17 फरवरी को महेन्द्र नगर कंजनपुर नेपाल निवासी राजेन्द्र अवस्थी को नशे के ब्यूरोकीन के 700 इनजैक्शन बरामद किए थे। 19 मार्च करतारपुर चौराहे के पास से पुलिस ने बगवाड़ा निवासी बलजीत सिंह को 37 पुडिय़ा अफीम के साथ गिरतार किया था। 21 अप्रैल को आवास निवास रुद्रपुर से पुलिस ने शिवपुरी बरेली निवासी लक्ष्मण सिंह को 18 पुडिय़ा स्मैक के साथ गिरतार किया था। 
2 मई को पुलिस ने मिलक रामपुर निवासी हर प्रसाद को 650 ग्राम अफीम के साथ गिरतार किया था। 9 जून को ट्रांजिट कैंप में पुलिस ने केसीघाट झारखंड निवासी दिनेश को 2 किलो 750 ग्राम अफीम के साथ गिरतार किया था। 12 अगस्त को पुलिस ने सितारगंज निवासी गुरमेज सिंह को 25 पुडिय़ा स्मैक के साथ गिरतार किया था। 13 अगस्त को हल्दुआ सितारंगज निवासी अजय कुमार को पुलिस ने 20 स्मैक की पुडिय़ा के साथ पकड़ा था। 14 सिंतबर को मलसी सितारंगज निवासी ऋषिपाल को पुलिस ने 20 पुडिय़ा स्मैक के साथ गिरतार किया था। इसी प्रकार वर्ष 2010 में अबतक पुलिस 35 लोगों को अफीम, चरस, स्मैक व हेरोइन के साथ गिरतार किया है। जिसमें 28 जनवरी काशीपुर पुलिस ने अशोक विहार निवासी सुरेश अरोरा को 26 किलो डोडा के चूरे के साथ गिरतार किया था। 10 मार्च पुलिस ने दिनेशपुर मोड़ में कृष्ण कुमार सैनी 900 ग्राम हेरोइन के साथ पकड़ा था। 27 मई पुलिस ने नानकमत्ता पुलिया के पास जसपुर निवासी कुलवंत सिंह को 5 स्मैक की पुडिय़ा के साथ गिरतार किया था। 6 जुलाई को दिनेशपुर पुलिस ने झारखंड निवासी प्रदीप को एक किलो अफीम के साथ गिरतार किया था।  12 जून को हल्दूआ सितारगंज निवासी भूप किशोर को पुलिस ने 25 पुडिय़ा स्मैक के साथ गिरतार किया था। 17 जून को पुलिस ने कानपुर निवासी जयप्रकाश को 70 पुडिय़ा स्मैक के साथ पकड़ा था। 23 जून हाथीखान सितारगंज निवासी गुरमेज सिंह को  पुलिस ने 15 पुडिय़ा स्मैक  के साथ पकड़ा था। 1 जुलाई सिंतारगंज में पुलिस ने बहेड़ी निवासी चन्द्रपाल को 30 स्मैक की पुडिय़ा के साथ पकड़ा था। 8 जुलाई को खटीमा पुलिस ने योगेश बाल्मिकी को 400 ग्राम स्मैक के साथ पकड़ा था।
इस प्रकार देखा जाए तो तराई में नशे का काला कारोबार लगातार फैलता जा रहा है। पुलिस की ओर से मामलों में की जा रही कार्रवाई के बाद भी यह करोबार रुकने का नाम नहीं ले रहा है।

आखिर कब मिलेगा ग्रामीणों को दीमकों से छुटकारा

अल्मोड़ा जिले के अंतिम गांव लंबाड़ी में दीमकों से बचाव के लिए वैज्ञानिकों द्वारा दी गई दवाइयां बेअसर हो रही है
                                              चंदन बंगारी रामनगर



एक दशक से भी अधिक समय से दीमकों के आतंक से झेल रहे अल्मोड़ा जिले के लंबाड़ी गांव के ग्रामीणों को इनसे निजात नही मिल सकी है। पंतनगर के वैज्ञानिकों द्वारा दी गई दवाइयों से दीमकों को कोई असर होता नही दिख रहा है। हर साल की तरह इस वर्ष भी बरसात में बढ़ती दीमकों की तादाद ग्रामीणों के लिए मुसीबत खड़ी कर रही है। गांव के कई घर गिरने की कगार पर पहंुच चुके है। ग्राम प्रधान का कहना है कि कई बार मांग करने के बावजूद सरकार ग्रामीणों को सरकारी इमदाद नही दे रही है। 
                    लंबाड़ी गांव में दीमकों द्वारा क्षतिग्रस्त किया गया एक भवन

समुद्र तल से 1300 मीटर ऊंचाई पर बसा लंबाड़ी अल्मोड़ा जिले के स्याल्दे ब्लाक का अंतिम गांव है। करीब तीस साल पहले अचानक गांव में दीमक लगना शुरू हुआ था। ग्रामीणों द्वारा दीपकों को नजरअंदाज करने से इनकी संख्या लगातार बढ़ती रही। गांव में बने घरों के दरवाजे, खिड़कियों के साथ ही दीमकों ने खेत व खाने के अनाज तक को नही छोड़ा। दीमकों ने गांव के कई घरों को खंडहरों में तब्दील कर दिया। जिसके बाद गांव से पलायन होना शुरू हो गया। करीब 5 परिवार गांव छोड़कर चले गए है। गांव में वर्तमान में 40 परिवारों में से 2 को छोड़कर बाकी बीपीएल श्रेणी के अर्न्तगत आते है।
गांव की खेती व फल सब्जियों को भी दीमकों ने चौपट कर दिया है। दीमकों से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने नागपुर से केले व क्लोरोगार्ड दवाइयां मंगाकर वितरित की थी। मगर इसका दीमकों पर कोई असर नही हुआ। जनवरी 2009 में पंतनगर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का दल गांव में आया था। दल के सर्वे में यह बात निकलकर आई थी कि गांव में बने मकानों में दीमकों का प्रकोप सबसे ज्यादा है। वहीं खेतों में 75 प्रतिशत व गंाव से सटे जंगल में 40 प्रतिशत दीमकों का प्रकोप मिला था। जिसके बाद वैज्ञानिकों ने ग्रामीणों को दवाइयां दी थी। जिसका प्रभाव न होता देख 16-17 जुलाई 2010 को वैज्ञानिकों के दल ने गांव में बने 40 मकानों व 39 गौशालाओं में कीटनाशकों का छिड़काव किया था। 2 ग्रामीणों को छिड़काव का तरीका बताते हुए कुछ दवाइयां भी थी। दवा के छिड़काव से ग्रामीणों को कुछ रहत जरूर मिली थी। मगर बरसात के अधिक पड़ने से दीमकों की बढ़ती तादात ग्रामीणों के लिए मुसीबत खड़ी कर रही है।
अल्मोड़ा जिले से लंबाड़ी गांव में दीमकों द्वारा क्षतिग्रस्त किया गया एक भवन

 दवा का कोई असर इन पर होता नही दिख रहा है। गांव में बने 40 में से 15 मकान ढहने की कगार पर पहुंच गए है। गांव में रहने वालों की आर्थिक स्थिति देखते हुए विधायक से लोगों ने नया मकान बनाने के लिए मदद की मांग की। दो साल बाद केवल एक महिला पदमा देवी के नाम पर इंदिरा आवास मंजूर हुआ है। ग्राम प्रधान पदम सिंह का कहना है कि वैज्ञानिकों के छिड़काव से असर होता नही दिख रहा है। खेतों व घरों में दीमक फिर से दिखाई दे रहे है। वैज्ञानिक मकानों को दोबारा बनाने की बात कहते है। मगर गांव में अधिकांश परिवार गरीब होने के कारण मकान बनाने में सक्षम नही है। कई जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों के दौरों के बावजूद अभी तक ग्रामीणों को सरकारी मदद नही मिल पाई है। मुआवजे के लिए भेजे गए प्रस्तावों पर भी कोई अमल नही हो पाया है।

दीमकों को समूल नष्ट करना संभव नही

रामनगर। पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डा. बीएस बिष्ट का कहना है कि दीमकों का समूल नाश नही किया जा सकता है। इन पर नियंत्रण जरूर पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इतने लंबे समय से आतंक मचा रहे दीमकों को तुरंत नियंत्रित करना संभव नही है। वैज्ञानिक दीमकों की बढ़ती तादात को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे है। जिसके तहत बदल-बदल का दवाइयों का प्रयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सामाजिक व आर्थिक जीवन में दीमकों के नुकसान को कम करने के प्रयास किए जा रहे है। उन्होंने कहा कि पहले घरों के भीतर लगे हुए दीमकों को नियंत्रित किया जा रहा है। उसके बाद ही खेतों पर नियंत्रण पाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि कई दशक पुराने मकानों को नया बनाने की जरूरत है।  

सरकार पर गांव की अनदेखी का आरोप 

रामनगर। क्षेत्र के जिला पंचायत सदस्य पूरन रजवार का कहना है कि किसी भी सरकार ने गांव में दीमकों की समस्या पर ध्यान नही दिया। पंतनगर विश्वविद्यायल ने व्यक्तिगत रूचि लेकर गांव में सर्वे व दवाइयां बांटी है। ग्रामीण लगातार शासन-प्रशासन ने इसे आपदाग्रस्त गांव घोषित करने की मांग करते आ रहे है। मगर अब तक उनकी मांगे पूरी नही हो सकी है। जिसके चलते गांव में पलायन बढ़ रहा है। हालांकि वैज्ञानिकों की दवाई से कुछ असर दीमकों पर पड़ रहा है। लेकिन सरकारी मदद अभी तक जीरो है। ग्रामीण नैन सिंह व बची सिंह का कहना है कि सरकारें गरीबों की नही सुनती है। इतने साल दीमकों के बीच गुजारे है। बाकी बचे साल भी ऐसे ही कट जाएंगे। हमारी बात सुनने वाला कोई नही है।  

 क्या है लंबाड़ी

 1300 मीटर की ऊंचाई पर बसा गांव 

 30 साल से दीमकों के आतंक से परेशान

 कई जनप्रतिनिधियों दौरे के बाद भी मदद नही मिली

 खंडहर में तब्दील हो रहे है घर 

 पलायन के बाद 40 परिवार रह गए गांव में

 वैज्ञानिकों की दवाएं भी बेअसर 


कृषि भूमि को बचाने के लिए कोई पहल नहीं


कृषि भूमि को बाढ़ लील रही है  वहीं मिट्टी माफिया भी खेतों को बंजर कर रहे हैं

सिल्ट निकालकर नदियों को गहरा कर बचाये जा सकते हैं खेत। 

राजेन्द्र तिवारी सितारगंज

तराई में नदियों का कटाव से हजारों एकड़ कृषि भूमि प्रतिवर्ष नदियों में समा रही है। वहीं मिट्टी माफिया भी उपजाऊं कृषि भूमि को पांच फिट तक खोदकर खेतों को बंजर कर रहे हैं। सरकारों की कोई नीति नहीं होने से कृषि भूमि का रकवा कम होता जा रहा है। सितारगंज क्षेत्र में ही बैगुल, सूखी, कैलाश देवहा कामन निहाई नदियों के भूकटाव से सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि नदियों में समा गई है। सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि में कई फिट सिल्ट भर गई है। जो कई वर्षों तक खेती योग्य नहीं रह गई है। नदियों के कटाव को रोकने के लिए सरकारों ने कोई पहल नहीं की। मंत्रीगण बरसात के दिनों में आश्वासन देकर कृषि भूमि को बचाने के लिए के आश्वासन दे जाते हैं। लेकिन ठोस नीति बनाने के लिए इन्हें भी फुर्सत ही नहीं दिखती




सितारगंज नानकमत्ता शक्तिफार्म क्षेत्र में नदियां हर वर्ष सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि को बंजर करती जा रही है। लेकिन इन सबसे बेपरवाह सरकारी महकमे हर वर्ष बाढ़ सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये पानी में बहा देता है। मनरेगा समेत तमाम योजनाओं को पैसा तब खर्च किया जाता है जब नदियां उफान पर होती हैं। बाढ़ इन कार्यों को एक ही झटके में बहा ले जाती है। पिछले चार वर्षों में नदियों की तबाही रोकने के लिए सिंचाई विभाग ने सितारगंज क्षेत्र की नदियों से तबाही रोकने के लिए करीब 25 करोड़ की योजनायें स्वीकृत कराई हैं। लेकिन धन आवंटित नहीं होने से कार्य समय पर नहीं हो पाये। जिसका खामियाजा गत वर्षों की भांति इस वर्ष भी क्षेत्रवासी भुगत रहे हैं। गत वर्षों की भॉति इस वर्ष भी राजनेताओ व उच्चाधिकारियों के दौरे बाढग़्रस्त क्षेत्रों में हो रहे हैं। इस वर्ष भी बाढ़ का कारण नदियों में सिल्ट भरना बताया जा रहा है। अधिकारी पिछले वर्षों में भी इसी को कारण बताते आये हैं। लेकिन नदियों में से सिल्ट निकालकर गहरा व चौनलाईज नहीं किया। बाढ़ सुरक्षा के नाम पर करोड़ों प्रतिवर्ष खर्च हो रहे हैं। लेकिन नदियों को गहरा व चौनलाईज करने की योजनायें फाईलों में बन्द है।
यदि सरकार नदियों से सिल्ट निकालने की अनुमति दे दी गई होती तो तराई में उपजाऊं खेतों को खोदकर कृषि भूमि को बंजर कर रहे मिट्टी माफियाओं से भी निजात मिलती। जो हर वर्ष हजारों एकड़ कृषि भूमि में कई फिट मिट्टी खोदकर कृषि भूमि को बंजर कर रहे हैं। सिल्ट निकालने से सरकार को आय भी होती। नदियों में समाने वाले खेत भी सुरक्षित रहते। साथ ही प्रति वर्ष बाढ़ सुरक्षा के नाम पर करोड़ों के धन की बर्बादी भी रुकती।


Monday, September 6, 2010

उत्तराखंड में मारे गए सबसे अधिक गुलदार

राज्य में एक वर्ष में 29 गुलदार बने शिकार

टाइगर प्रोटेक्शन ईयर 2010 में सबसे अधिक बाघों के मारे जाने पर उठे सवाल
            (जहांगीर राजू, रुद्रपुर से)

वर्ष 2010 को भले ही टाइगर प्रोटेक्शन ईयर के रुप में मनाया जा रहा है। बावजूद इसके इस वर्ष में काफी संख्या में गुलदार के मारे जाने की घटनाएं हो रही है। स्थिति यह है कि टाइगर प्रोटेक्शन ईयर में उत्तराखंड में सबसे अधिक गुलदार व तेंदुए के मारे जाने के मामले सामने आए हैं। 
उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय वन एवं पयार्वरण मंत्रालय ने वर्ष 2010 को टाइगर प्रोटेक्शन ईयर के रुप में घोषित किया है। जिसके चलते देशभर में बाघों को बचाने के लिए मुहिम चली हुई है। देशभर में सेमिनार के माध्यम से लोगों को बाघों के संरक्षण के प्रति जागरुक किया जा रहा है। साथ ही बाघों की सुरक्षा के लिए तमाम नीतियां बनायी जा रही हैं। ऐेसे में देश में काफी संख्या में बाघों का मारा जाने से पूरी मुहिम का काफी धक्का लग रहा है। स्थिति यह है कि इस वर्ष देश में 240 गुलदार मारे हैं, जिसमें से 130 गुलदार को लोगों ने शिकार बनाया। इस दौरान मानव-पशु संघर्ष में 17, सडक़ दुर्घटनाओं मंे 19, वन विभाग द्वारा गोली मारने से 8, राहत कार्यों के दौरान  गुलदार मारे गए। साथ ही दो तेंदुओं को बड़े जानवरों ने मार डाला। सालभर में 58 गुलदार मारे हुए पाए गए।  
भारतीय वन्य जीव संरक्षण सोसायटी के खुलासे के मुताबिक उत्तराखंड में इस वर्ष सबसे अधिक बाघ मारे गए हैं। राज्य में इस वर्ष 29 गुलदार का शिकार हुआ। यहां चार बाघ मानव-पशु संघर्ष में मारे गए। इस साल राज्य में 15 गुलदार की खाल व हड्डी बरामद की गयी। उत्तराखंड की तरह महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश व कर्नाटक में भी गुलदारों के मारे जाने की घटना बढ़ी है। महाराष्ट्र में इस वर्ष 15 गुलदार शिकारियों का शिकार बने। उत्तर प्रदेश में 13 व कर्नाटक में 12 गुलदार का शिकार हुआ।  
उत्तराखंड के मुख्य वन संरक्षक परमजीत ङ्क्षसह के मुताबिक वर्ष 2007 में राज्य में 2300 गुलदार थे। इस साल बाघों की गणना के लिए रिपोर्ट तैयार की जा रही है। जिससे राज्य में गुलदार की सही संख्या का अंदाजा लगाया जा सकेगा।
कार्बेट टाइगर रिजर्व में रह चुके डा.पराग मधुकर धकाते बताते हैं इस वर्ष वन महकमे ने वन अपराधियों पर शिकंजा कसा है। जिसके चलते गुलदार के मारे जाने की बड़ी घटनाएं सामने नहीं आयी हैं। बावजूद इसके वन अपराधी कम नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा कि गुलदार का शिकार करने वाले सिंडिकेट को समाप्त करने के लिए देशव्यापी मुहिम चलाए जाने की जरुरत है।  







बाखूल बना लोगों के लिये कवच

21वीं शदी में भी वर्षों पूराना पहनावा पहन रहें है लोग
                                केशव भट्ट, बागेश्वर


बागेश्वर। जिस गांव में ना कोई फैक्ट्री हो और ना ही उस गांव के वाशिंदों को हो इसकी दरकार। बावजूद इसके भेड़-बकरियों के ऊन से ये लोग अपनी पुरातन कला से जो कपडा बनाते हैं वो इनके शरीर के लिए कवच का सा काम करता है। जो कि इन्हें सदियों से जाडे व बरसात से बचाता आ रहा है।
हॉं! यह बात है तहसील कपकोट के सुदूरवर्ती गांव की। जो आज भी इनकी धरोहर है। जहां पूरी दुनियां 21वीं शदी के फैशन में मस्त है वहीं बाखूल नाम से जाना जाने वाला और वास्कट की तरह दिखने वाला यह गणवेश मल्ला दानपुरवासियों के लिए सही मायने में शरीर का कवच है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पल-पल मौसम बदलते रहता है। खेती-बाडी, पशुओं को चराने के लिए जंगल ले जाने समेत रोजमर्रा के कामों में इन क्षेत्रों में मौसम हर पल बाधक बनते रहता है। यहां के वाशिंदों के बुर्जगों ने इस समस्या के निदान हेतु भेड़-बकरियों के ऊन से कताई कर कपड़ा बनाना शुरू किया था। इस परंपरा को लोग आज भी बखूवी निभा रहे हैं। जिले के झूनी गांव के खीम सिंह बताते हैं कि हाथ से ऊन कताई के बाद फिर चान से बुनाई कर कपड़ा बनाया जाता है। तैयार उस ऊन की पट्टी के कपड़े को पख्खा कहते हैं। डेढ फीट ऊंचा चूल्हा बनाकर उसके उप्पर ढाई फुट लम्बा तथा दो फीट चौड़ा समतल पत्थर रखा जाता है। ऊन के पाख्खे को आधा घ्ंाटा पहले पानी में भीगने के लिए छोड़ दिया जाता है। तब तक चुल्हे में रखे पत्थर को आग में खुब गर्म किया जाता है। 
बाद में पख्खा को उस पत्थर पर लगभग 2 घंटे तक पैर से  मसला जाता है। इससे उस कपड़े के सभी रूवां जल कर सख्त हो जाते हैं और कपड़े के बीच में सूक्ष्म छिद्र बंद हो जाते हैं। इस विधि से पख्खा मोटा होकर एक तरह से वाटरपूफ्र बन जाता है। बाद में हम इसे बच्चे, जवान व बुर्जुग के नाप के अनुरूप सिर्फ बाजू निकालने वाली जगह को काट कर स्वयं ही कताई के बने धागे से सिलाई करते हैं। खीम सिंह बताते हैं कि बाजार की छाता व बरसाती की अपेक्षा हमारा बनाया हुवा बाखुल काफी सुविधाजनक और शुद्व होता है। घर हों या जंगल में बाखुल पहना हो तो काम करते हुवे बेफिक्री रहती है। 6 माह तक हिमालयी बुग्यालों में बकरियों के साथ रहने वाले अनवालों के लिए तो यह कवच ही साबित होता है। बर्फबारी, आंधी तुफान और तेज बरसात में कंदराओं में रहते समय उनका यह कवच ही उन्हें बचाता है। 
दानपुर क्षेत्र का यह आविष्कार सीमांत क्षेत्रों तक ही सीमित होकर रह गया। नई पीढी धीरे-धीरे इससे बिमुख होते जा रही है। उत्तराखंड के बागेश्वर, पिथौरागड़, चमोली और उत्तरकाशी के सीमांत क्षेत्रों में हस्तशिल्प की यह कला सरकारी उपेक्षा के चलते दम तोड़ने लगी है। हांलाकि सरकार ने हस्तशिलप के संरक्षण तथा विकास के लिए खादी बोर्ड, कुमाउं विकास मंड़ल, जन जाति निगम, उद्योग विभाग सहित कई संस्थाएं स्थापित की हैं। लेकिन इन संस्थाओं ने भी कभी ईमानदारी से इस कारोबार को विकसित करने के प्रयास नहीं किये। 



बरसात में कोबरा करेत व वाइपर है जान के दुश्मन

कोबरा सा जहर रखने वाला करेत प्रजाति का सांप घरों व गांदामों में भोजना की तलाश में आने के कारण इंसान को ज्यादा शिकार बनाता है
                                          चंदन बंगारी रामनगर


बरसात का मौसम आते ही लोगों के जेहन में बसे ज्यादा डर अगर किसी को होता है तो वह है सांपों का। हो भी क्यूं ना बरसात होते ही बिलों में पानी भरने की वजह से यह भारी संख्या में बाहर निकल आते है। भोजन की तलाश में बाहर निकले सापों का सामना अनायास ही इंसान से हो जाता है। तब इंसान व सांपों के बीच संघर्ष खड़ा होता है। यही वजह है कि बरसात के मौसम में अधिकांश स्नेक बाइट की घटनाएं सामने आती है। जिनमें कई लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते है। 
बरसात के समय निकलने वाले प्रदेश में ज्यादातर सांपों में से तीन प्रजाति के ही सांप ज्यादा विषैले होते है। सांप पहली अनूसची में आते है। जिनमें पहला किंग कोबरा प्रजाति का सांप होता है। प्रदेश में कोबरा प्रजाति के इंडियन कोबरा व किंग कोबरा दोनों प्रकार के सांप पाए जाते है। फन वाले इस सांप को प्रजाति का राजा माना जाता है। कोबरा में न्यूरोटॉक्सिक टाइप जहर होता है। जहर की ज्यादा मात्रा होने के कारण यह अन्य सांपों की तुलना में बेहद खतरनाक माना जाता है। प्रदेश में कोबरा की दोनों प्रजातियां कार्बेट टाइगर रिजर्व, तराई, धारचुला, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत में ज्यादा पाई जाती है। खास तौर पर यह सांप जंगल में ही रहना ज्यादा पसंद करता है। इसलिए जंगल जाने वाले लोगों का ही सांप से सामना होता है। ज्यादातर मामलों में यह सांप लोगों पर ही भारी पड़ता है। अभी कुछ महीनों पहले विश्व का सबसे बड़ा किंग कोबरा रामनगर के चूनाखान के पास एक झरने में मृत मिला था। सांपों में दूसरी सबसे विषैला सांप करेत है। सांप के आधे धड़ से काले व सफेद प्रकार के घेरे बने हुए होते है। यह काफी शर्मीला व अचानक वार करने वाला सांप होता है। यह कब डसकर चले जाय इसका पता नही चल पाता है। यह सांप भोजन की तलाश में घरों व गोदामों में आ जाता है। यह अकेला बिस्तर तक पहुंच रखने वाला सांप है। कभी-कभी तो यह सांप कपड़ों, गददों, अल्मारी तक में मिल जाता है। जिसके कारण यह लोगों के लिए खतरा बन जाता है।
सबसे ज्यादा लोग इसी सांप के काटने से मौत के मुंह में चले जाते है। इस सांप का वैज्ञानिक नाम बुगेंरस है। इसमें भी कोबरा की तरह न्यूरोटॉक्सिन प्रकार का जहर पाया जाता है। करैत का जहर सीधे नर्वस सिस्टम पर असर करता है। जिस व्यक्ति को करैत डसता है उसे इसका अहसास तक नही होता है। इसके शिकार व्यक्ति को पेट में असहनीय दर्द उठता है। जिसके बाद उसका गला बंद होने लगता है। इस जहर इतना खतरनाक होता है कि कुछ ही मिनटों में इंसान की जान पर आफत बन आती है। कई बार तो इसका शिकार व्यक्ति पेट में दर्द की दवाई ले लेता है। बाद में जब इसके काटे होने का पता चलता है तो बहुत देर हो जाती है। इसके अलावा तीसरी प्रजाति वाइपर की होती है। निम्न हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला वाइपर का सिर तिकोना होता है। वहीं उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हिमालयन पिट वाइपर पाया जाता है। दोनों की प्रजाति के सांपों में हीमोटॉक्सिक प्रकार का जहर होता है। वहीं शांत प्रजाति का सांप पाइथन भी कभी कभार भोजन की तलाश में आबादी में घुस आता है। वहीं पानी में पाए जाने वाले सांप भी अक्सर लोगों को दिखाई देते है। मगर इन सांपों के काटने से इंसान का जीवन खतरे में नही पडता है। फिर भी इन सांपों के काटने पर डाक्टर को तुरंत दिखा लेना चाहिए। 

क्या कहते है डाक्टर

रामनगर। कार्बेट टाइगर रिजर्व में तैनात डा. सत्यप्रियगौतम भल्ला कहते है कि सांप के काटने पर इंसान को कतई घबराना नही चाहिए। घबराने से हार्ट पर असर होने पर जहर तेजी से शरीर में फैलता है। काटे वाली जगह पर पटटी न बांधे व इस स्थान को साबुन से धोने के बाद अस्पताल में उपचार कराएं। वहीं संयुक्त चिकित्सालय में तैनात डा. केके जोशी कहते है कि सांप काटने के मामले में एंटी स्नेक वेनम दिया जाता है। जरूर यह है कि मरीज कितनी जल्दी अस्पताल पहुंचता है। वह कहते है कि सांप काटने वाली जगह पर किसी भी प्रकार का कोई कट न करें।

क्षेत्र के लोग चंद्रसेन के ही सहारे 

रामनगर। रामनगर में रहने वाला चंद्रसेन पेशे से पेंटर है। उन्हें जहरीले सांप पकड़ने का अदभुत हुनर है। जनसेवा करने का शौक रखने वाले चंद्रसेन लंबे अरसे से सांप पकड़कर जंगल में छोड़ते आ रहे है। 31 अगस्त की रात उन्होंने कानियां स्थित नाले के पास से जहरीला किंग कोबरा पकड़ा। कोबरा लोगों के घरों में घुसने का प्रयास कर रहा था। ग्रामीणों ने कोबरा को पत्थर मारकर घायल कर दिया था। ग्रामीणों की सूचना पर चंद्रसेन ने कोबरा को पकड़ लिया। मगर वन विभाग के अधिकारियों की लापरवाही के चलते कोबरा इलाज के अभाव में मर गया। वहीं चंद्रसेन ने पैठपड़ाव स्थित राम अवतार के घर से 5 फुट का पाइथन पकड़ा। वहीं कोसी रोड स्थित स्टेट बैंके पास रहने वाले विमल महरोत्रा के घर कोबरा सांप घुस आया। जिसको चंद्रसेन ने पकड़ लिया। इसके अलावा भरतपुरी में भोपाल सिंह रमोला के घर से 3 फुट व चोरपानी में रहने वाली मुन्नी देवी के घर से 4 फुट लंबा पाइथन पकड़ा। हिम्मतपुर डोटियाल से उन्होंने देर रात 10 फुट लंबा अजगर पकड़ा है। उन्होंने इन जहरीले सांपों को पकड़कर घने जंगल में ले जाकर छोड़ दिया। चंद्रसेन करीब 15 सालों से लोगों के घरों में घुसे सांपों को पकड़कर जंगल में छोड़ते आ रहे है। मगर वन विभाग से किसी भी प्रकार का सहयोग न मिलने से वह बेहद दुखी है। उनका कहना है कि लोगों के बुलावे पर वह सांपों को घर से पकड़कर लाते है। मगर वन विभाग उन्हें कोई भी सुविधा उपलब्ध नही कराता है। जंगल में भी उन्हें सांप छोड़ने के लिए अपने वाहन से जाना पड़ता है। आज भी जब लोगों के घरों में सांप घुसता है तो लोग चंद्रसेन को ही याद करते है।  

वन कर्मियों को सिखाए सांप पकड़ने के गुर

रामनगर।  4 सितंबर को पहली बार पहल करते हुए वन परिसर के एफडीए हाल में कार्बेट पार्क प्रशासन के तत्वावधान में तराई पश्चिमी वन प्रभाग व कार्बेट के वनकर्मियों का प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ। प्रशिक्षण में कार्बेट के पशु चिकित्सक डा. सत्यप्रिय गौतम भल्ला ने कहा कि आमतौर पर बरसात के समय सांप ज्यादा निकलते है। प्रदेश में केवल तीन प्रजातियों कोबरा, वाइपर व करेत के ही सांप विषैले होते है। उन्होंने कहा कि वन कर्मियों का दायित्व है कि वह अन्य वन्यजीवों की तरह से ही सांपों को भी बचाएं। यह वन्यजीव प्रबंधन का ही एक हिस्सा है। अगर कहीं घायल सांप मिले तो उसे तुरंत पकड़कर उपचार के लिए डाक्टर के पास लेकर आए। उन्होंने बताया कि यंत्र से सांप पकड़ने में खासी सावधानियां बरतनी चाहिए। जरा सी असावधानी काफी घातक साबित हो सकती है। सांप को पकड़ने के बाद प्लास्टिक के बोरे में न रखें। क्यांेकि दम घुटने के कारण सांप मर जाते है। इस दौरान सांप की अन्य प्रजातियों व उनके व्यवहार के बारे में स्लाइड के माध्यम से बताया गया। इस दौरान 21 प्रशिक्षणार्थियों को सांप पकड़ने के लिए छड़ी, ग्लब्ज, चश्मा, हुक व किताब भी वितरित की गई।

प्रमुख घटनाएं 
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1 सितंबर रामनगर इलाके में एक ही दिन में कोबरा, वाइपर, पाइथन सहित 6 सांप पकड़े गए। इनमें से दो को छोड़कर सभी घरों से मिले 

.31 जुलाई को दिनेशपुर के दुर्गापुर में सांप के काटने से एक की मौत

.30 जुलाई को खटीमा व टनकपुर में चार लोगों को सांप ने काटा, एक महिला की मौत

.रामनगर के बैड़ाझाल में 26 जुलाई को सांप के काटने से दो चचरे भाइयों की मौत

.6 जून को रामनगर के गर्जिया गांव में रहने वाले महेश राम के घर से मिला 12 फुट लंबा किंग कोबरा    

Sunday, September 5, 2010

औद्योगिकरण के नाम पर बंजर हो रही तराई की भूमि


नए उद्योग नहीं लगने से विरान पडे़ औद्योगिक प्लाट

टाटा को नहीं दी गयी सितारगंज में पड़ी बंजर भूमि

तराई के सितारगंज में 1000  सिडकुल रुद्रपुर में 60 एकड़ भूमि बंजर पड़ी हुई है।

                            जहांगीर राजू रुद्रपुर 

तराई में पिछले छह माह से नए उद्योगों के लगने का सिलसिला बंद होने से औद्योगिक अस्थान की हजारों एकड़ भूमि बंजर होती जा रही है। कभी हरा सोना उगलने वाली उद्योगों के लिए खाली की गयी इस भूमि पर अब घास उग रही है।
 सितारगंज स्थित औद्योगिक क्षेत्र में बंजर पड़ी 107५ एकड़ भूमि
उल्लेखनीय है कि तराई में उद्योगों की स्थापना के लिए रुद्रपुर में 4 हजार एकड़ व सितारंगज में 2२26 एकड़ भूमि का औद्योगिक अस्थान के लिए अधीग्रहण किया गया था। जिसमें से सिडकुल रुद्रपुर में मार्च माह के बाद से नए उद्योगों की स्थापना नहीं होने के कारण 60 एकड़ भूमि बंजर हो चुकी है। यह भूमि भी पहले पंतनगर विश्विद्यालय के अधीन थी, जिसमें पहले धान व गेहूं की खेती की जाती थी। 

सितारगंज में सिडकुल को दी गयी दो 2२26 एकड़ से अधिक भूमि में से 107५ एकड़ भूमि बंजर पड़ी हुई है।  बताते चलें कि टाटा ने पहले उत्तराखंड सरकार से नैनो के प्लांट की स्थापना के लिए एक हजार एकड़ अतिरिक्त भूमि दिए जाने की मांग की थी, लेकिन तत्कालीन खंडूरी सरकार ने टाटा को इतनी अधिक भूमि देने से इनकार कर दिया था। उस वक्त यदि यह भूमि टाटा को दे दी जाती तो आज टाटा नैनो का मदर प्लांट साणंद गुजरात में होने के बजाए उत्तराखंड में होता। सरकार के गलत फैसले के चलते यह भूमि अब पूरी तरह से बंजर हो चुकी है।
रुद्रपुर स्थित सिडुकल में लगे उद्योग


औद्योगिक पैकेज की समय सीमा समाप्त होने के बाद से क्षेत्र में नए उद्योग नहीं लग पाने के कारण इस भूमि में अब घास उग रही है। इस भूमि को पहले बासमती जोन के लिए सुरक्षित रखा गया था, लेकिन सिडुुकल को हस्तांतरित होने के बाद से ही यह जमीन बंजर पड़ी हुई है। इस भूमि में पहले धान, गन्ना, गेहूं की फसलें लहलहाती थी। सरकार की लापरवाही के चलते यह भूमि न तो औद्योगिक क्षेत्र के लिए विकसित हो सकी और नहीं इसका उपयोग बासमती जोन को विकसित करने के लिए किया जा सका। यदि टाटा नैनो का प्लांट इस क्षेत्र में लगता तो इससे राज्य सरकार को हर वर्ष दो हजार करोड़ से अधिक का राजस्व प्राप्त होता। अब शासन में बैठे बड़े अधिकारियों व सत्ताधारियों को कौन बताए कि बंजर भूमि से सरकार को कभी राजस्व नहीं मिलता।


Friday, September 3, 2010

उत्तराखंड में आर्किड के उत्पादन से स्वावलंबन

 राज्य में आर्किड के 240 प्राकृतिक प्रजातियां मौजूद

राज्य में उद्योग केे रुप में स्थापित हो सकती है खूबसूरत आर्किड के फूलों की खेती
                                            (जहांगीर राजू, रुद्रपुर से)

उत्तराखंड में खूबसूरत आर्किड के फूलों की खेती के माध्यम से बड़े पैमाने पर लोगों के रोजगार से जोड़ा जा सकता है। राज्य में आर्किड की 240 प्रजातियां मौजूद हैं। ऐसे में राज्य केे बेरोजगार युवाओं के लिए आर्किड क उत्पादन स्वावलंबन का माध्यम बन सकता है।
उल्लेखनीय है कि आर्किड के खूबसूरत फूलों की नार्थ इस्ट एशिया में बड़ी मांग है। विश्व भर में आर्किड के एक लाख से अधिक हाईब्रीड प्रजातियां हैं। उत्तराखंड की अगर बात की जाए तो  यहां की जलवायु आर्किड के उत्पादन के लिए उपयुक्त है। जिसके चलते राज्य में प्राकृतिक रुप से खूबसूरत आर्किड के फूलों की 240 प्रजातियां हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र में इस फूल की 750 प्रजातियां मौजूद हैं। ऐसे में राज्य में आर्किड के फूलों के उत्पादन को एक उद्योग के रुप दिया जा सकता है। आर्किड के फूलों का उत्पादन कर इसे बड़े पैमाने पर विदेशों के निर्यात किया जा सकता है।
आर्किड पर शोध कर चुके डा.डीएस जलाल बताते हैं कि आर्किड ग्रुप की लोरिकल्चर के क्षेत्र में पूरे विश्व  में काफी मांग है। उत्तराखंड में 30 से 40 फीसदी आद्रता वाले क्षेत्रों में आर्किड का बेहतर उत्पादन किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में सिमडियम व डैन्ड्रोबियम प्रजाति के आर्किड प्रमुखता से पाए जाते हैं। इन आर्किड की कट लोवर के रुप में विश्व के फूल बाजार में काफी मांग है। वर्तमान में भारत में यह फूल हांगकांग से आयात किया जा रहा है। इस फूल की एक स्टीक 25 से 30 रुपये में मिलती है। एक फूल में इसकी 8 से 10 स्टीक तक होती हैं। उत्तराखंड से इस आर्किड को भारी मात्रा में निर्यात किया जा सकता है। साथ ही पोलबाइन आर्किड को पाकेट लोवर के रुप में विकसित किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि टिशू कल्चर के माध्यम से आर्किड का राज्य में अच्छा उत्पादन किया जा सकता है। जिससे आर्किड की गुणवत्ता के साथ ही उसका उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है। डा. जलाल ने बताया कि बंग्लौर, केरल में आर्किड के उत्पादन को एक उद्योग के रुप किया जा रहा है।
 उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में आर्किड को उद्योग के साथ ही पर्यटन से भी जोड़ा जा सकता है। डा. ललित तिवारी बताते हैं कि उत्तराखंड में आर्किड के उत्पादन को उद्योग का रुप दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि बेहतर संभावना के बावजूद राज्य में आर्किड के कल्टीवेशन का कार्य अबतक शुरू नहीं हो पाया है। जबकि यहां पेड़ों में स्वेतरू पैदा होने वाली आर्किड की सैकड़ों प्राकृतिक प्रजातियां मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि बेहतर जलवायु वाले क्षेत्र में आर्किड की खेती को मॉडल के रुप में कर उसे पूरे राज्य में विस्तार दिया जाना चाहिए।

शहीद के परिजन दो जून की रोटी के लिये मोहताज

                                        राज्य गठन के दस साल बाद भी नहीं मिला न्याय
                                                            पूरन कापड़ी खटीमा

शहीद परमजीत के माता पिता
इस छाव घनेहरी से वह धूप ही अच्छी थी, वह जिस्म जलाती थी तो यह रुह जलाती है यह टिस है राज्य आंदोलन के दौरान शहीद हुए परिजनों की। जो राज्य गठन के दस साल बीत जाने के बाद भी दर-दर के ठोकरें खाने के मजबूर हैं। राज्य आंदोलन के दौरान 1 सितंबर 1984 केे खटीमा में हुए गोलीकाण्ड में सलीम, भवान सिंह, प्रताप सिंह शहीद हो गये थे तथा धर्मानन्द भट्ट, परमजीत सिंह, गोप चन्द, रामपाल सिंह लापता हो गये थे। जिन्हें बाद में शहीद घोषित कर दिया गया था।  इन सात शहीदों में से सबसे दयनिय स्थिति में परमजीत के  परिवार है। 
बतादें कि 1 सितम्बर 1984 केे परमजीत अपने घर से दोस्तों के साथ खटीमा में जुलुस के नेतृत कर रहा था। परमजीत सिंह जैसे लोगों की शहादत के बाद राज्य भी प्राप्त हो गया। लेकिन शहीद के बुढ़े मां-बाप आज भी दो जून की रोटी के लिए मोहताज हैं। प्रदेश सरकार ने शहीदों के परिवार वालों केे जो भी आर्थिक सहायता दी थी वह परमजीत की पत्नी चरनकौर ने ले ली और दूसरी शादी कर उज्जैन चली गई। लेकिन परमजीत के पिता नानक सिंह व  उनकी पत्नी सरनकौर  अपने इकलौते लडक़े की  मौत के बाद अहसाय हो गये हैं।शहीद केे परिजनों केे पास रहने केे लिए मकान नहीं है इसलिए किराये के मकान में रहते है। नानक सिंह चश्मे की फेरी लगाते है लेकिन उम्र केे बड़ते पड़ाव में पहुंच जाने के कारण अब फेरी का काम भी ज्यादा नहीं हो पा रहा है। ऐसे में नानक सिंह व  उनकी पत्नी दोनों को दो जून की रोटी के लिए भी तरसना पड़ रहा है।
हीं क्षेत्र के कुछ समाजसेवियों के प्रयास के बाद 2005 में उन्हें सरकार की ओर से वर्ग चार की भूमि का पट्टा भी दिया गया है। लेकिन उस पर दबंगों का कब्जा है और मामला न्यायालय में विचाराधीन है। नानक सिंह कहते है खाने केे रोटी नहीं मिल पा रही है ऐसे में न्यायालय में लडऩे का साहस नहीं हो पा रहा है।